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पंजाब के मानसा जिले के छोटे से गांव थुथियांवाली के रहने वाले 25 वर्षीय हरप्रीत सिंह सिधु उर्फ ‘हैप्पी’ की कहानी न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि यह यह भी दर्शाती है कि मेहनत, धैर्य और स्मार्ट सोच से एक आम किसान भी अपने जीवन की दिशा बदल सकता है। आज के बदलते कृषि परिदृश्य में हरप्रीत जैसे युवा किसानों की सफलता की कहानियां एक नई उम्मीद जगाती हैं। कभी 12 लाख रुपये के कर्ज़ में डूबा यह युवक आज न केवल खुद आत्मनिर्भर है, बल्कि दूसरों को भी कर्ज़ से मुक्त करने के मिशन पर काम कर रहा है, जो ग्रामीण भारत के लिए एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है।
संघर्षों भरा बचपन और अनपेक्षित मोड़
हरप्रीत का जीवन अचानक तब बदल गया जब उनके बड़े भाई की एक मामूली विवाद में हत्या हो गई। इस त्रासदी ने पूरे परिवार को तोड़ दिया। न्याय की लंबी और महंगी लड़ाई लड़ने के चक्कर में परिवार की आर्थिक रीढ़ टूट गई—सोना बिका, मवेशी बिके और आख़िरकार पैतृक ज़मीन भी गिरवी रखनी पड़ी। 11वीं के बाद हरप्रीत को अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी और परिवार का भरण-पोषण करने के लिए 600 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से टेंट लगाने का काम करना पड़ा। यह एक ऐसा समय था जब दैनिक कमाई से कर्ज़ का सूद और दुकानदारों के पैसे चुकाना असंभव लगने लगा था। लेकिन हरप्रीत ने हार नहीं मानी और एक नया रास्ता तलाशने की ठान ली। यह घटना ग्रामीण भारत में किसानों के सामने आने वाली अनपेक्षित चुनौतियों और उनके भीतर छिपी अदम्य इच्छाशक्ति का एक जीवंत उदाहरण है।
योजना का नाम | कृषि विविधीकरण प्रोत्साहन पहल (Agricultural Diversification Promotion Initiative) |
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किसने शुरू किया | भारत सरकार (कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय) |
उद्देश्य क्या है | किसानों को परंपरागत फसलों जैसे गेहूं और धान से हटकर अधिक लाभप्रद सब्जियों, फलों और फूलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करना, जिससे उनकी आय में वृद्धि हो और कृषि जोखिम कम हो। इसमें आधुनिक कृषि तकनीकों और बाज़ार तक पहुंच को बढ़ावा देना भी शामिल है। |
शुरुआत कब हुई | वर्ष 2025 से विभिन्न राज्यों में चरणबद्ध तरीके से लागू। |
Official Website | (भारत सरकार के कृषि मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध) |
ऑफ-सीजन खेती से चमकी किस्मत
साल 2017 में, सिर्फ 17 साल की उम्र में हरप्रीत ने एक साहसिक कदम उठाया। उन्होंने परंपरागत खेती जैसे गेहूं और धान की बजाय ऑफ-सीजन सब्जी खेती करने का जोखिम लिया। उस समय उनके पास सिर्फ 1.3 एकड़ ज़मीन ही बची थी जो गिरवी नहीं थी। इस नई राह पर चलने के लिए उन्होंने 30,000 रुपये उधार लिए और कद्दू, तोरी, मटर और ज़ुकीनी जैसी सब्जियों की ऑफ-सीजन बुवाई की। यह एक ऐसा निर्णय था जिसने उनकी और उनके परिवार की ज़िंदगी बदल दी, और यह आज भी छोटे किसानों के लिए एक व्यवहार्य विकल्प है।
परिणाम चौंकाने वाले थे—सिर्फ 10 महीनों में हरप्रीत ने 6 लाख रुपये की कमाई की, जिसमें से 5 लाख रुपये का कर्ज़ चुकाया गया। यह उनके परिवार और पूरे गांव के लिए अविश्वसनीय था। हरप्रीत ने साबित कर दिया कि सही समय पर सही फ़सल का चुनाव और बाज़ार की मांग को समझना कितनी अहम भूमिका निभाता है। ऑफ-सीजन खेती का मतलब है जब बाज़ार में किसी सब्ज़ी की कमी होती है, तब उसे उगाना, जिससे बेहतर दाम मिल सकें। 2025 में, किसान ऑनलाइन मार्केटप्लेस और कृषि सलाह ऐप्स का उपयोग करके बाज़ार के रुझानों को अधिक कुशलता से ट्रैक कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, krishi.cloud और AgriMarket जैसे ऐप किसानों को रियल-टाइम डेटा प्रदान करते हैं।

कोविड-19 की चुनौती और सच्ची दोस्ती
2020 में जब कोविड-19 महामारी की वजह से सब कुछ ठप हो गया, तब हरप्रीत की फसलें खेतों में ही सड़ गईं। मंडियां बंद थीं और परिवहन रुक गया था। आय का कोई साधन न होने पर, उन्होंने ग्रामीणों के साथ बार्टर सिस्टम के तहत सब्जियां गेहूं के बदले दे दीं, लेकिन कोई नकद आय नहीं हुई। ऐसे मुश्किल समय में उनके मित्र गुरप्यार ने एक फरिश्ते की तरह मदद की। उन्होंने हरप्रीत को 0.75 एकड़ ज़मीन बिना किराए के दे दी, यहां तक कि डीज़ल का खर्चा भी खुद उठाया। हरप्रीत ने बाद में सब चुका दिया, सिवाय उस दोस्ती के एहसान के, जिसे वह हमेशा याद रखते हैं। यह दर्शाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी मानवीय संबंध और दृढ़ता कितनी महत्वपूर्ण होती है।
ऐसे संकटों से निपटने के लिए अब किसान उत्पादक संगठन (FPO) और डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर मॉडल जैसी पहलें अधिक महत्वपूर्ण हो गई हैं। किसानों को अब प्रधानमंत्री कृषि उड़ान योजना जैसी योजनाओं से भी मदद मिल रही है, जिससे खराब होने वाली फसलों को हवाई मार्ग से जल्दी पहुंचाया जा सकता है।
2023 के बाद सफलता की नई उड़ान
निरंतर मेहनत और सही रणनीति से हरप्रीत ने तीनों एकड़ ज़मीन दोबारा अपने नाम कर ली, जो कभी गिरवी रखी गई थी। वर्ष 2024 तक उन्होंने 10 मरले का एक नया पक्का घर भी बना लिया, जो उनके सपनों के साकार होने का प्रतीक है। वे गर्व से कहते हैं, “मेरी मां कभी बिना पंखे वाले घर में रहती थीं, आज उनके कमरे में AC है।” यह बात हरप्रीत की सफलता और उनके परिवार के प्रति उनके समर्पण को दर्शाती है।
हरप्रीत अपनी खेती की योजना को बड़े ही सुनियोजित तरीके से अंजाम देते हैं। वे बताते हैं, “जब मटर की परंपरागत खेती नवंबर में खत्म हो जाती है, तब मैं टनल में इसकी बुवाई करता हूं।” टनल फार्मिंग उन्हें ऑफ-सीजन मटर उगाने में मदद करती है, जिससे जनवरी की शुरुआत में ही तुड़ाई शुरू हो जाती है और बाज़ार में अच्छे दाम मिलते हैं। टनल फार्मिंग जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और फसलों को कीटों से बचाने में भी बेहद कारगर साबित हुई है, जिससे 2025 में इसकी लोकप्रियता काफी बढ़ी है।
मटर से सिर्फ एक एकड़ में उन्होंने ₹2.2 लाख कमाए, जिसमें से ₹50,000 की लागत घटाकर शुद्ध मुनाफा ₹1.7 लाख रहा। इसके बाद उसी खेत में मार्च तक लोबिया (cowpea) की फसल ली, जिससे ₹7-8 लाख की आय हुई और ₹4-5 लाख का शुद्ध मुनाफा हुआ। यह दर्शाता है कि एक ही ज़मीन पर अलग-अलग सीज़न में अलग-अलग फ़सलें उगाकर कितनी ज़्यादा आय अर्जित की जा सकती है, खासकर जब खेती के आधुनिक तरीके का उपयोग किया जाए।
स्मार्ट प्लानिंग ही है सफलता की कुंजी
हरप्रीत की खेती योजना साल भर चलती है, जिसे वह “स्मार्ट प्लानिंग” कहते हैं। इस प्लानिंग में वे मौसम, बाज़ार की मांग और लागत को ध्यान में रखते हैं। उदाहरण के लिए, वे सॉइल हेल्थ कार्ड और कृषि विशेषज्ञों की सलाह पर भी ध्यान देते हैं, ताकि मिट्टी की उर्वरता बनी रहे और उपज अच्छी हो। 2025 में, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित फसल प्रबंधन सिस्टम किसानों को और भी सटीक जानकारी और मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं, जिससे वे बेहतर निर्णय ले पा रहे हैं।
यहां हरप्रीत सिंह की प्रेरणादायक कहानी को दर्शाने वाला एक वीडियो है:
परिवार बना सबसे बड़ा सहारा और डिजिटल मार्केटिंग का उपयोग
हरप्रीत मानते हैं कि उनका परिवार उनकी सबसे बड़ी ताकत है। उनकी पत्नी और बच्चे न केवल उनका साथ देते हैं, बल्कि खेती के कामों में भी मदद करते हैं। इसके अलावा, हरप्रीत ने डिजिटल मार्केटिंग का भी उपयोग करना शुरू कर दिया है। वे अपनी फसलों की जानकारी और उपलब्धता सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर डालते हैं, जिससे उन्हें सीधे ग्राहकों तक पहुंचने में मदद मिलती है। व्हाट्सएप और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म किसानों के लिए अपने उत्पादों को बेचने और ग्राहकों से जुड़ने के लिए महत्वपूर्ण उपकरण बन गए हैं।
एक छोटे से गांव से निकलकर, हरप्रीत ने न केवल खुद को आत्मनिर्भर बनाया बल्कि दूसरों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बने।
दूसरों को भी बना रहे आत्मनिर्भर
हरप्रीत अब दूसरे किसानों को भी ऑफ-सीजन खेती और स्मार्ट प्लानिंग के बारे में सिखा रहे हैं। वे उन्हें बताते हैं कि कैसे कम लागत में अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है और कैसे बाज़ार की मांग को समझकर सही फसल का चुनाव किया जा सकता है। हरप्रीत का मानना है कि ज्ञान बांटने से बढ़ता है, और वे चाहते हैं कि उनके गांव और आसपास के इलाके के सभी किसान आत्मनिर्भर बनें। उन्होंने एक किसान हेल्प डेस्क भी शुरू की है, जहां वे किसानों को मुफ्त सलाह और मार्गदर्शन देते हैं।
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